चाणक्य की प्रेरणादायी जीवनी | Chanakya Biography in Hindi
चाणक्य की प्रेरणादायी जीवनी | Chanakya Biography in Hindi

Chanakya Biography Hindi | चाणक्य की जीवनी

चाणक्य को भारत के एक महान राजनीतिज्ञ और अर्थशास्त्री के रूप में जाना जाता है। उनके पिता चणक मुनि एक महान शिक्षक थे। कहां जाता है कि चाणक्य का जन्म तक्षशिला य दक्षिण भारत में 350 ईसापूर्व के आसपास हुआ था। उनकी मृत्यु का अनुमानित वर्ष 283 ईसापूर्व बताया गया है।

Chanakya Biography Hindi | चाणक्य की जीवनी
चाणक्य की प्रेरणादायी जीवनी | Chanakya Biography in Hindi

किंग मेकर चाणक्य

चाणक्य को विष्णुगुप्त, वात्सायन,मल्लनाग,। अंगल, द्रमिल और कौटिल्य भी कहा जाता है। कहा जाता है कि पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं— यह बात चाणक्य पर शत प्रतिशत सही साबित होती है। जरा इन बातों पर गौर कीजिए—

जन्म के समय से ही चाणक्य के मुंह में पुरे दांत थे। यह राजा या सम्राट बनने की निशानी थी। लेकिन क्योंकि उनका जन्म ब्राह्मण परिवार में हुआ था, इसलिए यह बात सच नहीं हो सकती थी। इसलिए उनके दांत उखाड़ दिए गए और यह भविष्यवाणी की गई कि वह किसी और व्यक्ति को राजा बनवाएंगे और उसके माध्यम से शासन करेंगे।

चाणक्य ने जन्मजात नेतृत्वकर्ता के गुण मौजूद थे। वे अपने हम उम्र साथियों से अधिक बुद्धिमान और तार्किक थे।

चाणक्य कटु सत्य को कहने से भी कभी नहीं चूकते थे। इसी कारण पाटलिपुत्र के राजा घनानंद ने उन्हें अपने दरबार से बाहर निकाल दिया था। कभी चाणक्य ने प्रतिज्ञा ली थी कि वे नंद वंश को जड़ से उखाड़ फेंकेंगे।

अपने लक्ष्य को पूरा करने के लिए चाणक्य ने बालक चंद्रगुप्त को चुना, क्योंकि उसमें जन्म से ही राजा बनने के सभी गुण मौजूद थे।

चंद्रगुप्त के के दुश्मन थे। राजा नंद भी उनमें शामिल था। उसने उन्हें कई बार विष देकर मारने की कोशिश की।अतः चंद्रगुप्त की विष प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के लिए चाणक्य ने उसे भोजन में थोड़ा-थोड़ा विष मिला कर देना आरंभ कर दिया।

चंद्रगुप्त को भोजन में विष दिए जाने की बात ज्ञात नहीं थी, इसलिए एक दिन उसने अपने भोजन में से थोड़ा अपनी पत्नी को भी दे दिया, जो 9 माह की गर्भवती थी। विष की तीव्रता वह नहीं झेल पाई और काल कवलित हो गई। लेकिन चाणक्य ने उसका पेट चीर कर नवजात शिशु को बचा लिया।

वह शिशु बड़ा होकर एक योग्य सम्राट बिंदुसार बना। उसका सुबंधु नाम का एक मंत्री था। सुबंधु चाणक्य को फूटी आंखों पसंद नहीं करता था। उसने बिंदुसार के कान भरने शुरू कर दिए कि चाणक्य उसकी माता का हत्यारा है।

तथ्यों को जांचे-परखे बगैर बिंदुसार चाणक्य के विरुद्ध खड़ा हो गया। लेकिन जब उसे सच्चाई ज्ञात हुई तो वह बहुत लज्जित हुआ और अपने दुर्व्यवहार के लिए चाणक्य से क्षमा मांगी। उसने सुबंधु से भी कहा कि जाकर चाणक्य से क्षमा मांगे।

सुबंधु बड़ा कुटिल व्यक्ति था। चाणक्य से क्षमा मांगने का बहाना करते हुए उसने धोखे से उनकी हत्या कर दी। इस प्रकार, राजनीतिक षड्यंत्र के चलते एक महान व्यक्ति के जीवन का अंत हो गया।

शिक्षा-

चाणक्य के पिता चणक मुनि एक शिक्षक थे इसलिए शिक्षा का महत्व अच्छी तरह समझते थे। अपने पुत्र को उन्होंने अच्छी शिक्षा प्रदान की। कम उम्र में जब बच्चे बोलना भी ठीक से शुरू नहीं कर पाते है , चाणक्य ने वेद का अध्ययन आरंभ कर दिया था

अल्पकाल में ही वेदों में पारंगत होकर चाणक्य का झुकाव राजनीति की ओर हुआ। जल्दी ही वह राजनीति की बारीकियों को समझने लगे। वे समझ गया कि विरोधियों के खेमे में अपने आदमी कैसे शामिल किए जाते हैं और दुश्मनों की जासूसी कैसे की जाती है। इसके अलावा उन्होंने अर्थशास्त्र एवं हिंदू शास्त्रों का अध्ययन किया और बाद में उन्होंने चाणक्य नीति नीतिशास्त्र ,अर्थशास्त्र जैसे महान कालजयी ग्रंथों की रचना की।

तक्षशिला में शिक्षा समाप्त करके चाणक्य वही शिक्षक के रूप में कार्य करने लगे। वह विद्यार्थियों के आदर्श थे। उनके दो शिष्यों— भद्रभट्ट और पुरुष दत्त का उल्लेख अनेक स्थानों पर आया है। चाणक्य के लक्ष्य को प्राप्त करने में उनका हम योगदान बताया गया है। यह भी कहा जाता है कि वह दोनों चाणक्य के जासूस थे और उनके शत्रुओं के बारे में जानकारियां जुटा कर उन तक पहुंचाया करते थे।

इसी दौरानअपने सूत्रों से चाणक्य को ज्ञात हुआ कि यूनान का महान सम्राट सेल्युकस भारत के कमजोर शासकों पर आक्रमण करने वाला है। इस प्रकार भारत की एकता पर खतरा मंडरा रहा था। इस आराजक स्थिति का लाभ उठाते हुए पाटलिपुत्र के कुटिल शासक धनानंद ने अपनी प्रजा का शोषण करना आरंभ कर दिया। विदेशी आक्रमण से लोहा लेने की आड़ में उसने जनता पर तरह तरह के कर थोप दिए । एक ओर विदेशी हमलावर कमजोर राज्यों पर टकटकी लगाए थे तो दूसरी और पड़ोसी देश अपने कमजोर पड़ोसियों को हथियाने के फिराक में थे। चाणक्य विदेशी और भीतरी— दोनों खतरों पर नजर रखे थे। इस उथल पुथल ने उनकी रातों की नींद छीन ली और उन्होंने तक्षशिला को त्यागकर पाटलिपुत्र लौटने का इरादा कर लिया।

चाणक्य की शपथ

पाटलिपुत्र के राजा घनानंद एक अनैतिक और क्रूर स्वभाव का व्यक्ति था। उसका बस एक ही उद्देश्य था— किसी भी तरह धन संचय करना। वह धन के मामले में पूरी तरह असंतुष्ट था। प्रजा को वह कांटे की तरह खटकता था; लेकिन कोई उसके खिलाफ बोलने का दूसरा हक नहीं कर पाता था। प्रजा तरह-तरह के करो से दबी हुई थी। कर वसूली का उद्देश्य केवल राजा की स्वार्थ पूर्ति करना था। चमड़े, लकड़ी और पत्थरों पर भी कर वसूली करता था। घनानंद का खजाना पूरी तरह भरा था, फिर भी उसके लालच का अंत नहीं था।

जब चाणक्य पाटलिपुत्र पहुंचे तो राजा घनानंद के व्यवहार में थोड़ी नरमी आई। वह गरीबों की मदद करने लगा। उसने गरीबों की मदद के लिए एक समिति का गठन किया। इस समिति में विद्वान और समाज के प्रभावशाली लोग शामिल थे।

चाणक्य भी क्योंकि तक्षशिला के महान विद्वान थे, इसलिए उन्हें भी इस समिति में शामिल कर लिया गया। बाद में चाणक्य इस समिति के प्रमुख भी बनाए गए। समिति के प्रमुख अक्सर राजा से मिलते रहते थे। इसी क्रम में चाणक्य जब पहली बार धनानंद से मिले तो उनकी कुरूपता के कारण उन्हें अपमान झेलना पड़ा समय के साथ चाणक्य के प्रति घनानंद की घृणा बढ़ती ही गई चाणक्य के कठोर किंतु सत्य शब्द भी घनानंद को चुभते थे। इसी प्रकार घनानंद और चाणक्य के बीच शत्रुता बढ़ती गई। राजा को चाणक्य का या व्यवहार बड़ा अ रुचिपूर्ण लगता था । इसलिए एक दिन उसने चाणक्य को उनके पद से हटा दिया। इस अपमान से चाणक्य तिलमिला उठे और उन्होंने शपथ ली कि वे तब तक अपनी शिखा नहीं बांधेंगे जब तक कि घनानंद को सिंहासन से ना उखाड़ फेंकेंगे।

चंद्रगुप्त से भेंट

राजा से अपमानित होकर चाणक्य पाटलिपुत्र की गलियों में दनदनाते हुए आगे बढ़ रहे थे। एका एक काटे ने उनका पैर बैघ दिया वह लड़खड़ाकर तेजी से संभले। विद्वान चाणक्य का परिस्थितियों से निपटने का अपना अलग ही तरीका था। उन्होंने कांटे के उस पौधे को देखा, जिसका कांटा उन्हें लगा था। उस समय क्योंकि वह क्रोध में थे, इसलिए उसे अनियंत्रित नहीं होने देना चाहते थे। इसलिए शांतिपूर्वक चिलचिलाती धूप में बैठ गए और कांटेदार पौधे की जड़ से उखाड़ने लगे। थोड़ी देर बाद जब जड़ सहित पूरा पौधा उखाड़ कर बाहर आ गया तो उसे एक और फेंक कर उन्होंने फिर से अपनी राह पकड़ ली।

चाणक्य कांटेदार पौधे को उखाड़ रहे थे तो उनकी तन्मयता को एक युवक गौर से देख रहा था वह चंद्रगुप्त था— मौर्य साम्राज्य का भावी शासक। उसका चेहरा तेजपूर्ण था। चाणक्य की दृढ़ता देखकर वह प्रभावित था और उस ज्ञानी पुरुष से बात करना चाहता था।

वह चाणक्य के निकट पहुंचा और उनसे आदरपूर्वक बात करने लगा। चाणक्य ने उसकी परिवारिक प्रश्न करते हुए पूछा तुम कौन हो? कुछ चिंतित दिखाई पड़ते हो?

युवक चंद्रगुप्त ने आदरपूर्वक आगे झुकते हुए कहा” श्रीमान आपका अनुमान ठीक है। मैं बहुत मुसीबत में हूं। लेकिन अपनी परेशानी बता कर मैं आपको परेशान नहीं करना चाहता

चाणक्य ने उसे दिलासा देते हुए कहा” तुम निसंकोच अपनी परेशानी मुझे बता सकते हो। यदि मेरे बस में हुआ तो मैं तुम्हारी सहायता अवश्य करूंगा।

मैं राजा सर्वार्थसिद्धि का पौत्र हूं। उनकी दो पत्नियां थी— सुनंदा देवी एवं मुरा देवी। सुनंदा के 9 पुत्र हुए, जो नव् नंद कहलाए। मुरा के एक पुत्र था, जो मेरे पिता थे। ईर्ष्या बस नवनंद हम सभी की जान लेने पर तुले हुए थे। किसी तरह से मैं बचा रहा, पर मेरा पूरा जीवन बर्बाद हो गया है। मैं नंद से प्रतिशोध लेना चाहता हूं, जो इस समय देश पर शासन कर रहे हैं:

दुश्मन का दुश्मन दोस्त घाव खाए चाणक्य को नंद के विरुद्ध एक साथी मिल गया था। चंद्रगुप्त की कहानी सुनकर चाणक्य को गहरा धक्का लगा। भावना से भर कर उन्होंने प्रतिज्ञा की वे नंद वंश का नाश करके चंद्रगुप्त को उसकी सही जगह पाटलिपुत्र के राज सिंहासन पर आरूढ़ करने तक चैन से नहीं बैठेंगे।

चाणक्य ने कहा” मैं तुम्हें राजपद तक पहुंचाऊंगा, चंद्रगुप्त!

उस दिन से चंद्रगुप्त और चाणक्य क्रूर व अत्याचारी नंद के कुशासन का अंत करने में जुट गए। चंद्रगुप्त के बारे में ठीक ठीक कहीं कुछ नहीं लिखा गया है। जन्म स्थान, पारिवारिक पृष्ठभूमि, और उसके जीवन से जुड़ी अन्य जानकारियां उपलब्ध नहीं है। उसके माता-पिता के बारे में अलग-अलग ग्रंथों में अलग-अलग बातें लिखी हुई है। वास्तव में वह मोरिया सामुदाय से संबंध था। इसी के बाद संभवतः उसे ‘चंद्रगुप्त मौर्य’ नाम दिया गया और उसका राजवंश ‘मौर्य वंश’ के नाम से जाना गया। कहा जाता है कि उसकी माता एक गांव के मुखिया की बेटी थी। उसके पिता पिपतवन नामक जंगली इलाके के राजा थे, जो एक युद्ध के दौरान मारे गए थे। चंद्रगुप्त अपनी माता के साथ पाटलिपुत्र आया था।

चंद्रगुप्त में नेतृत्वकर्ता के जन्मजात गुण थे। बालकों में भी सब उसे अपना नेता मानते थे । बालकों के राजा के रूप में वह अपना दरबार लगाता था और न्याय करता था। साहस और सूझ-बूझ के गुण बचपन में ही उसमे दिखाई देने लगे थे। जब चाणक्य पाटलिपुत्र की गलियों से गुजर रहे थे तो उन्होंने एक सिंहासननुमा ऊंची चट्टान पर चंद्रगुप्त को राजसी अंदाज में बैठे देखा था। उसके सामने बालकों का समूह फरियादी बनकर फरियाद कर रहा था। चंद्रगुप्त का प्रभाववान मुखमंडल और बुद्धिमत्तापूर्ण संभाषण सुनकर चाणक्य बहुत प्रभावित हुए थे।

सात-आठ वर्ष तक चंद्रगुप्त ने शिक्षा ग्रहण की। उसके शिक्षकों का चयन स्वयं चाणक्य ने किया था। इसके बाद युद्ध-कला और शासन—दोनों में चंद्रगुप्त पारंगत हो गया।

सिकंदर का आक्रमण

इतने वर्षों के दौरान चंद्रगुप्त एवं चाणक्य की मैत्री खूब फली-फूली हुई थी और शत्रुओं का सामना करने के लिए उन्होंने एक बड़ी सेना संगठित कर ली थी।  इस बीच चाणक्य और चंद्रगुप्त ने कई ऐतिहासिक घटनाएं देखी।  दर्शकों  तक भारतीय उपमहाद्वीप पर सिकंदर एवं अन्य कई हमलावारों ने आक्रमण किए।  कहा जाता है कि चंद्रगुप्त और सिकंदर का आमना-सामना भी हुआ। चंद्रगुप्त के साहस और सख्त रवैया ने सिकंदरपुर को रुष्ट कर दिया था।  परिणामस्वरुप सिकंदर ने चंद्रगुप्त को बंदी बना लिया।  चाणक्य का प्रशिक्षण चूँकि पूरा हो चुका था, इसलिए चंद्रगुप्त के युद्ध कौशल को परखने के लिए उन्होंने उसे खुला छोड़ दिया था।  सिकंदर की युद्ध-नीति का चाणक्य ने गहन अध्ययन किया था।  साथ ही वे भारतीय शासकों की कमजोरियों के प्रति भी सचेत है।

अपने सेनानायकों की कमजोरी के चलते सिकंदर की ताकत भी घटने लगी थी।  सिकंदर के रहते ही निकोसर नामक उसका एक वीर सेनानायक मारा गया।  बाद में फिलीप नामक एक अन्य सेनानायक, जिसे दुर्जेय समझा जाता था, उसकी मौत ने सिकंदर को बुरी तरह तोड़ कर रख दिया।  बेबीलोन में सिकंदर की मृत्यु के बाद उसकी सभी सेनानायक या तो मारे गए या  खदेड़ दिए गए। 321 ई.पू. में सिकंदर के सैन्य अधिकारियों ने उसके साम्राज्य को आपस में बांट लिया।  यह तय हुआ कि सिंधु के पूर्व में उनका शासनाधिकार समाप्त हुआ।  इस प्रकार उन्होंने स्वयं स्वीकार कर लिया कि भारत के उस हिस्से पर अब उनका अधिकार नहीं रहा।

 नंद की पराजय

नंद पर आक्रमण से पहले चाणक्य ने एक सुदृढ़ रणनीति तैयार की।  चाणक्य ने शुरू में आक्रमण की नीति को शहर के मध्य भाग पर आजमाकर देखा।  उन्हें बार-बार पराजय का सामना करना पड़ा।  अपनी रणनीति को बदलते हुए चंद्रगुप्त और चाणक्य ने इस बार  मगध साम्राज्य की सीमाओं पर आक्रमण किया।  लेकिन इस बार भी उन्हें निराशा हाथ लगी।

चंद्रगुप्त और चाणक्य ने पिछली गलतियों से सबक लेकर रणनीति में परिवर्तन किया और निकटवर्ती राजा पर्वतक से मैत्री कर ली।  उसके योग्य मंत्री,  अमात्य राक्षस का सहयोग भी उसके लिए किसी वरदान से कम नहीं था।  अमात्य राक्षस एक योग्य और राजा का स्वामीभक्त मंत्री था।  चाणक्य एक योजना तैयार करके नंद के खेमे में अपने  जासूस छोड़ दिए।  थोड़े ही समय के भीतर नंद की कमजोरियां उन पर जाहिर हो गई।  दूसरी ओर नंद और अमात्य राक्षस चाणक्य के हमले से बचने की योजना बनाने में जुटे थे।

नंद और चंद्रगुप्त एवं चाणक्य के बीच हुए युद्ध का ब्यौरा उपलब्ध नहीं है, लेकिन वह निश्चय ही एक भीषण और भयावह युद्ध था।  उसमें नंद मारा गया।  उसके पुत्र और संबंधी भी मारे गए।  अमात्य राक्षस भी असहाय हो गया।  इस प्रकार चाणक्य ने नंद वंश को उखाड़ फेंका।

 चाणक्य की मूल भावना

चाणक्य का प्रतिशोधपूर्ण जीवन व्यक्तियों को प्रतिशोध लेने की भावना को प्रेरित करता है।  लेकिन व्यक्तिगत प्रतिशोध अचानक का उद्देश्य नहीं था।  वे चाहते थे कि राज्य सुरक्षित रहे, शासन सुचारू ढंग से चले और प्रजा सुख-शांतिपूर्वक रहें।  उन्होंने लोगों की संपनता सुनिश्चित करने के लिए दो तरीके अपनाएं।  पहला, अमात्य राक्षस को चंद्रगुप्त का मंत्री बना दिया गया; दूसरा, एक पुस्तक लिखी गई, जिसमें राजा के आचार व्यवहार का वर्णन किया गया कि वह शत्रुओं से अपनी और राज्य की  रक्षा कैसे करें; कानून-व्यवस्था को कैसे  सुनिश्चित करें आदि।

चाणक्य का सपना था कि राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से भारत विश्व में अग्रदूत बने।  उनकी पुस्तक ‘अर्थशास्त्र’ में उनकी सपनों के भारत के दर्शन किए जा सकते हैं।  नीतिशास्त्र एवं चाणक्य नीति में उनकी विचारोतेजकता से प्रेरणा ग्रहण की जा सकती है।  उनके कुछ विचारों से उनके सामाजिक दृष्टिकोण को समझा जा सकता है—

  • जनसामान्य की सुख-संपन्नता ही राजा की सुख-संपन्नता है।  उनका कल्याणी उसका कल्याण है।  राजा को अपने निजी हित या कल्याण के बारे में कभी  नहीं सोचना चाहिए, बल्कि अपना सुख अपनी प्रजा के सुख में खोजना चाहिए।
  • राजा का गुप्त कार्य है निरंतर प्रजा के कल्याण के लिए संघर्षरत रहना।  राज्य  का प्रशासन  सुचारू रखना उसका धर्म है।  उसका सबसे बड़ा उपहार है— समान व्यवहार करना।
  • आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था श्रेष्ठ अर्थव्यवस्था है, जो विदेश व्यापार पर निर्भर नहीं होनी चाहिए।
  • समतावादी समाज हो, जहां सबके लिए समान अवसर हों।
  • चाणक्य के अनुसार, संसाधनों के विकास के लिए प्रभावी भू-व्यवस्था होनी आवश्यक है।  शासन के लिए यह आवश्यक है कि वह जिम्मेदारों पर नजर रखें कि वे अधिक भूमि पर कब्जा न करे और भूमि का अनधिकृत इस्तेमाल न करें।
  • राज्य का कानून सबके लिए समान होना चाहिए।
  • नागरिकों की सुरक्षा सरकार के लिए महत्वपूर्ण होनी चाहिए, क्योंकि वही उनकी एकमात्र रक्षक है जो केवल उसकी उदासीनता के कारण ही असुरक्षित हो सकती हैं।

चाणक्य एक ऐसे समाज का निर्माण करना चाहते थे, जो भौतिक आनंद से आत्मिक आनंद को अधिक महत्व देता हो।  उनका कहना था कि आंतरिक शक्ति और चारित्रिक का विकास के लिए आत्मिकता विकास आवश्यक है।  देश और समाज के आत्मिक विकास की तुलना में भौतिक आनंद और उपलब्धियां हमेशा  द्वितीयक हैं।

2300 वर्ष पहले लिखे गए चाणक्य के ये शब्द आज भी हमारा मार्गदर्शन करते हैं।  अगर उनकी राजनीति के सिद्धांतों का थोड़ा भी पालन किया जाए तो कोई भी राष्ट्र महान, अग्रदूत और अनुकरणीय बन सकता है।

Read more about Chanakya in Hindi on Wikipedia

Do You Want To Be Inspired? Read More Inspiring Posts:


did you like this article share it with your friends. share your comments.
अगर आपके पास हिन्दी में कोई Inspirational story,motivational article या ऐसी कोई भी जानकारी है जो आप लोगो तक पोहुचना चाहते है तो आप हमें email पर भेज सकते है,अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें.
धन्यवाद

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here